Write for us

राष्ट्र संवादराष्ट्र संवाद की स्थापना के सत्रह वर्ष पूर्ण हुए। दशकों से जमे प्रिंट मीडिया के दिग्गजो के लिए यह बहुत मामूली और सामान्य सी बात हो सकती है। लेकिन हमारे लिए यह बेहद गर्व का अवसर होने के साथ ही आत्मलोचना और मीडिया की दशा-दिशा की पड़ताल करने का भी अवसर है। हमारे लिए ‘राष्ट्र संवाद का सत्रह साल का सफर पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ते रहने का जद्वोजहद भरा कठिन सफर रहा है। यह सत्रह साल दुश्मन हवाओं के तेज थपेड़ो के बीच एक मशाल को जलाए रखने का जुझारू संधर्ष रहा है। पत्रकारिता वास्तव में मशाल जलाए रखने जैसा ही मुश्किल काम है। मशाल का काम अंधेरा में रास्ता दिखाना होता है। यथार्थ के आलोक में सही रास्ता दिखाना ही मीडिया का मूल उद्वेश्य है। परन्तु कॉरपोरेट कल्चर एवं बाजार के अति प्रभावशाली हो जाने के कारण कलम भी उससे प्रभावित हो गई है। सही ढंग से कहा जाए तो कलम ‘बाजारू’ हो गई है। सही को सही लिखने का साहस बड़े-बड़े कलमवीरों में नहीं बचा है। बड़े-बड़े संपादक सत्ता प्रतिष्ठानों की कृपा प्राप्त करने के लिए ‘कलम’ से तरह तरह की तिकड़मे करते रहते है। उनकी लेखनी हमेशा किसी-न-किसी का स्तुति गान ही करती रहती है। बदले में किसी को मोटे वेतन व धोड़ा-गाड़ी के साथ कही का सलाहकार बना दिया जाता है तो कोई-कोई राज्यसभा की मेम्बरी हासिल कर लेता है। इन स्वनामधन्य’सेलेब्रिटी’ पत्रकारों के प्रति विश्वास डगमगाने लगता है। लेकिन फिर इन्हीं लोगों के धटिया आचरण के कारण यह विचार और दृढ़ होता है कि पत्रकारिता को उसके आदशार्े से भटकने नहीं देना है। ‘राष्ट्र संवाद’ इसी दृढ़ संकल्प का परिणाम है। सत्ता के मठाधीशो के दरवार में चरणों से आचरण करने वालों में दशकों से स्थापित तथा कथित राष्ट्रीय मीडिया से लेकर शहर जिला मुख्यालयों से निकलने वाले स्थानीय अखबार इलेक्ट्रानिक मीडिया तक सभी शामिल है। देश के सवार्ेधिक प्रतिष्ठित अखबारों में शामिल टाईम्स ऑफ इंडिया का हाल यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जब से उसे बैनेट यूनिवर्सिटी के लिए ग्रेटर नोएडा में 68 एकड़ जमीन रियायती दामों पर आवंटित की है, तबसे यूपी की समस्याओं को लेकर उसका नजरिया बदल गया है। टाईम्स ऑफ इंडिया आजकल आम आदमी पार्टी व  अरविंद केजरीवाल का प्रवक्ता सा बना हुआ है। अन्य अखवारो का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की जगह वे कभी धाटे का सेना रोते है तो कभी पत्रकारो से ही लिखवा लेते है कि उन्हें वेतन आयोग द्वारा अनुशांसित वेतन की आवश्यकता नहीं क्योंकि उन्हें पहले से ही इससे ज्यादा वेतन मिलता है। पत्रकारों को अनुशांसित वेतन न देने के तरह-तरह के हथकंडे अपनाने वाले ये अखबार ही अपने पन्नो पर खुद को सर्वाधिक पढ़ा जाने बाला नंबर वन अखबार भी धोषित करते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाल तो और भी बुरा है। कुछ समाचार चैनलो पर तो दिन भर कोई-न-कोई ज्योतिषाचार्य बैठा हुआ ‘शनि’ से मुक्ति के उपाय बताता नजर आता है। उससे मुक्ति मिलती है तो कामेडी शो के फूहड़ फिल्मी मजाक का तरह-तरह के भाव्यो के साथ पुन: प्रसारण चलता रहता है। और जब समाचारो की बारी आती है तो फटा-फटा 200 खबरें आने लगती हैं जिसमें छोटी-मोटी चोरी चमारी की मामूली खबरों को भी बड़े सनसनीखेज ढंग से राष्ट्रीय समाचार के रूप में पेश किया जाता है। फिर चैनल अपने एजेंडे और दलीय निष्ठा के अनुसार भाषणनुमा खबरें प्रस्तुत करते है। मतलब यह कि पत्रकारिता के नाम पर अधिकांशत: यही सब हो रहा है। मीडिया दलीय निष्ठा के आधार पर बंट गया है। न वह निष्पक्ष रहा, न स्वतंत्र उसका अपना विवेक भी जैसे नहीं बचा हैं। सब कुछ एक भेड़ चाल सा लगता है। किसी नेता या सेेलेब्रिटी के मुंह से कुछ उल्टा सीधा निकल जाए तो मीडिया कई-कई दिन तक उस पर बहस करता रहता है। असल में यह जरूरी मुद्वों विषयों से मुंह चुराने का बचकाना प्रयास ही हैं। विवेक मीडिया को जनपक्षीय बनाता है। लेकिन स्वार्थ उसे यथार्थ से मुंहमोड़ने को विवश करता है इसीलिए वह गैर जरूरी बातों में उलझा रहता है। अखबार चैनल अपनी दलीय निष्ठाओं को इतने बेशर्म तरीके से प्रदर्शित करते हैं कि उन्हें राजनीतिक दलों के साथ नत्थी किया जाने लगा है। अखबार चैनल व स्वनामधन्य बड़े-बड़े सेलेब्रिटी पत्रकारो की शक्ल देखकर ही पता चल जाता है कि वह किस दल की पैरवी करेगा पत्रकारिता की यह दशा दयनीय है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाने वाला मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार को तिलांजलि दे चुुका है और लेाकतंत्र के अन्य स्तंभो पर अंकुश लगाने की अपनी भूमिका को स्वत: ही सीमित करता जा रहा है। ‘राष्ट्र संवाद’ अपने सीमित साधन संसाधान के बावजूद स्वतंत्र निष्पक्ष और विवेकपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इस प्रयास में हमें अपने सुधि पाठकों व शुभचिंतको का भरपूर सहयोग मिला है। हम अपने पाठको शुभ चिंतको को विश्वास दिलाते है कि ‘राष्ट्र संवाद’ भविष्य में भी अपनी यह भूमिका ईरमानदारी के साथ निभाता रह

 

स्थानीय संपादक गौरव भारद्वाज

mobile number- 9955111070, 8877735963

EMAIL-rsnewslive@gmail.com