सारण जिले के सोनपुर (एशिया का सबसे बड़ा मेला) की कहानी ।

सारण जिले के सोनपुर (एशिया का सबसे बड़ा मेला) की कहानी ।
2 नबम्बर 17 से शुरू हो रही है सोनपुर मेला । जो विश्व विख्यात है पशु पक्षियों का मेला । यहाँ के चारो दिशा के है कहानी । 32 दिनों तक चलेगी यह मेला । मेला को विश्व विख्यात बनाये रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं यहाँ के लोग व् अधिकारी, प्रशासन ।
हरि (विष्णु) और हर (महादेव) का क्षेत्र है हरिहर क्षेत्र यानी सोनपुर। यह शैव और वैष्णव परंपरा का संगम। इस स्थल के साथ गज और ग्राह के युद्ध की कथा जुड़ी हुई है।
भगवान विष्णु के भक्त गज (हाथी) और मगरमच्छ (ग्राह) के बीच कौनहारा घाट में युद्ध हुआ था। ये कथा श्रीमदभागवत पुराण में आती है। भगवान विष्णु का प्रिय भक्त राजा इन्द्रद्युमन एवं गंधर्व प्रमुख हूहू को ऋषि अगस्त मुनि एवं देवाल मुनि के श्राप से गज एवं ग्राह योनि में जन्म लेना पड़ा। गज और ग्राह की लड़ाई गंडक नदी में नेपाल में शुरू हुई थी। उनके बीच सालों युद्ध होता रहा। कभी ग्राह हाथी को खीच कर जल में ले जाता तो कभी हाथी ग्राह को खींच कर किनारे पर ले आता। कोई हारने को तैयार नहीं था। दोनों गंगा गंडक के संगम पर हरिहर क्षेत्र में के पास पहुंचकर निर्णायक युद्ध के करीब पहुंचे।
सोनपुर और हाजीपुर के बीच गंडक नदी का विस्तार ।
उधर, स्वर्गलोक में भगवान विष्णु अपने भक्त गज और ग्राह की सारी गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे, पत्नी लक्ष्मी के बार-बार आग्रह करने पर की आप का भक्त मर जाएगा। कुछ कीजिए। भगवान विष्णु बोले अभी समय नहीं आया है, अभी वह अपने भरोसे संघर्ष कर रहा है। उसको मेरी जरुरत नहीं है। पर जब इस युद्ध में गज हारने लगा तब जीवन संकट में देख वह पुकार उठा – हे गोबिंद राखो शरण अब तो जीवन हारे…।
अपने भक्त की पुकार सुनकर बिना देरी किए भगवान विष्णु बिना एक पल गवाएं खाली पैर भागे-भागे आए और अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह को मार कर अपने भक्त का दुख हर लिया और ग्राह को मरने के उपरांत स्वर्ग लोक भेज दिया। वास्तव में युद्ध में ग्राह की हार नहीं हुई क्योंकि गज का भगवान विष्णु ने साथ दिया इसलिए इस स्थल को कौनहारा भी कहते हैं। और इसलिए ये घाट कौनहारा घाटा कहलाता है।
गजेंद्र मोक्ष धाम – हरिहर क्षेत्र को गजेंद्र मोक्षधाम भी कहते हैं। हाजीपुर के कौनहारा घाट पर गज ग्राह की प्रतिमा बनवाई गई है। इस कथा को महत्व प्रदान करने के लिए हाजीपुर रेलवे स्टेशन की इमारत पर भी गज और ग्राह की युद्धरत प्रतिमा देखी जा सकती हैं । नारायणी नदी के किनारे स्थित है माँ दक्षिणेश्वरी काली मंदिर ।
बाबा रामलखनदास का मठ – हरिहरनाथ मंदिर के बगल में बाबा रामलखन दास का मठ है। बाबा शास्त्रीय संगीत के बड़े संरक्षक थे। यहां बाबा की पुण्य तिथि पर हर साल 7 अगस्त को शास्त्रीय संगीत की संध्या का आयोजन होता है। बाबा के जीवन काल में ये आयोजन भव्य स्तर पर होता था। यहां गोदई महाराज और सितारा देवी जैसे कलाकार पहुंचते थे। हरिहरनाथ मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित है जल भरत बाबा । जहाँ लोग दूर दूर से आकर मिष्ठान भोजन बनाते हैं और बाबा के ऊपर प्रसाद चढाते है । लोग प्रसाद ग्रहण करने के बाद वहाँ पर लोट पोट करते हैं । पशिचम दिशा के 3 किलो मीटर दूर भरपुरा गाँव में स्थित है भोले भंडारी के लिंग के साथ विरजमान है माँ पार्वती । इसकी भी कहानी अजूबा है । ऐसा मूर्ति कही नही है । इसके बाद ही है दक्षिण वाहनी गंगा नदी । जहा दूर दूर से आकर लोग स्नान करते हुए मोक्झ प्राप्त करने के लिए माँ से मनंत माँगते है । इसके बाद ही है माँ कालरात्री व् अंबिका भवानी । हरिहर नाथ मंदिर में हर शुभ कार्य करने वाले लोग आते हैं । गीत — हरिहरनाथ रउरा धन धन्य वाणी । रउरे करण लागे मेला इतना भारी ।। गज के व् मार के ग्राह के उवारली । हरिहरनाथ रउरा धन्य धन्य वाणी।। हमके उवारी बाबा लोगो के उबारी । राउर महिमा बाटे बड़ी रे निराली । संजीत ने गाना गवले मधुर ये वाणी ।हरिहरनाथ रउरा धन्य धन्य वाणी ।।