सिमरिया महाकुंभ-2017 कुंभ भारतीय संस्कृति का ऐसा प्रारूप है जिसने हजारों वर्षों से भारत को एक रखा है.

कुंभ भारतीय संस्कृति का ऐसा प्रारूप है जिसने हजारों वर्षों से भारत को एक रखा है. हमारे शास्त्रकारों ने, नीतिकारों ने कैसी सुंदर रचना की होगी कि नियत समय पर देश के हर हिस्से से लोग आध्यात्मिक महत्व के एक स्थान पर पूरे महीने के लिए इक्ट्ठा होते थे. इसके लिए न तो कोई इश्तहार छपता था और न हीं निमंत्रण पत्र भेजा जाता था.

कुंभ आध्यात्मिक उन्नति का साधन तो था ही, विचारों के आदान-प्रदान, व्यापार विनिमय, संस्कृतियों के सम्मिलन, देश की एकता-अखंडता, सुरक्षा, आपसी सद्भाव, सहयोग, सहमति, प्रर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, स्वास्थ्य संवर्धन और न जाने किन-किन बातों का आधार था.

प्राचीन काल में हम जिस महान भारत की बात करते हैं उसका बड़ा आधार निश्चित रूप से कुंभ की योजना ही रही. ज्योतिषीय रूप से कुंभ योग में लगने वाले वाले इन आयोजनों में जनसहभागिता पहले भी अद्भुत थी और आज भी यह दुनिया के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं. कुंभ में आने वाले विदेशी पत्रकार पूछते हैं- आखिर बिना किसी निमंत्रण के इतने लोक एक ही समय पर कैसे इक्ट्ठा हो जाते हैं.

कुंभ में जुटने वाले करोड़ो लोग दुनिया में किसी एक स्थान पर किसी एक उद्देश्य के लिए जुटने वाले सबसे अधिक लोगों का आयोजन है. यह भी दुनिया के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं. बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदला लेकिन कुंभ में आने वालों का सिलसिला नहीं.