कभी सोचा है जो रेशमी जुल्फें आप सैलून में कटवा आते हो, उनका क्या होता है

रेशमी जुल्फें आप सैलून में कटवा

कभी सोचा है जो रेशमी जुल्फें आप सैलून में कटवा आते हो, उनका क्या होता है

कभी सोचा है जो रेशमी जुल्फें आप सैलून में कटवा के, फिंकवा के चले आते हो, उनका क्या होता है. या फिर पिछली बार जब आप फलाने तीर्थ गए थे, तो वहां जो मुंडन करवा के चले आए थे, उन बालों का क्या हुआ? नहीं ही सोचा होगा. फेंकी हुई चीज की चिंता कौन करता है. अरे महाराज आप नहीं करते होंगे. पर बहुत लोग करते हैं. आपके बालों को सहेज कर रखा जाता है. वो भी बड़ी बारीकी से. काहे से इससे करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं. बाकायदा एक बड़ी इंडस्ट्री डेवलप हो गई है जो इन बालों का बिजनेस करती है. इनसे बनने वाले विग करोड़ों के बिक रहे हैं.

करोड़ों के बिक रहे हैं आपके बाल.

यही बिजनेस करने वाले दिल्ली के पंकज चितकारा ने कैरेवन मैग्जीन से बातचीत में बताया कि भारतीय लोगों के बालों की अच्छी खासी डिमांड है. ये बाल करीब 6 तरीके के होते हैं. मसलन स्ट्रेट, कर्ली, नैचुरल वेव, बल्क हेयर, डीप वेव और वेवी. और ये करीब 11 रंगों में बेचे जाते हैं. माने काले, हल्के काले, घनघोर काले, भूरे… वगैरह, वगैरह. और इन बालों की सबसे ज्यादा डिमांड अफ्रीकी देशों में है. माने ये बाल देश में तो बिक ही रहे हैं, एक्सपोर्ट भी हो रहे हैं. वो भी तगड़े दामों में. और इन बालों से विग बनाने का ये बिजनेस खाली दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में हो रहा है. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत का बालों का एक्सपोर्ट करने का बिजनेस 2015 में करीब 2,500 करोड़ का था. और ये बिजनेस 20-30% सालाना की दर से बढ़ रहा है. अकेले अफ्रीका में ही इन बालों की मार्केट करीब 6 बिलियन डॉलर सालाना की है.

आता कहां से है ये बाल

पहले तो तारीफ सुन ल्यो. भारतीय बालों की अफ्रीकी बाजार में डिमांड इसलिए है क्योंकि भारतीयों के बाल ज्यादा मोटे और मजबूत होते हैं. मतलब टिकाऊ. और अब मुद्दे की बात कि कहां से आते हैं ये भांति भांति के बाल. तो बता दें कि सारी सप्लाई सैलून्स और मंदिरों से हो रही है. हर साल 1 करोड़ से ज्यादा लोग तो अकेले तिरुपति के तिरुमला वैंकटेश्वर मंदिर में ही बाल मुंडवा लेते हैं. और यहां इन बालों को बारीकी से संभालकर रखा जाता है. इन्हें बाकायदा धोया, साफ किया जाता है. फिर छांटकर साइज के हिसाब से अलग, अलग बंडल बनाकर रखा जाता है. फिर इन्हें ई-ऑक्शन की मदद से बेच दिया जाता है. इस मंदिर के पैसे-रुपये का हिसाब रखने वाली संस्था तिरुमला तिरुपति देवास्थानम्स (टीटीडी) रोजाना करीब 500 किलो बाल इकट्ठा कर लेती है. 2015-16 में इन बालों को बेचकर ही टीटीडी ने 200 करोड़ रुपए इकट्ठे किए थे.

रेशमी जुल्फें आप सैलून में कटवा

अफ्रीकी देशों में मामला स्टेटस सिंबल से जुड़ा है

पहले अपने ही देश की बात कर लेते हैं. किसी के बाल झड़ने लगें तो सारे नाते-रिश्तेदार नाक में दम कर देते हैं. कुछ करो. वरना शादी नहीं होगी. और अफ्रीकी देशों में तो ये हालत और भी गंभीर है. वहां तो लोगों के बाल तमाम प्राकृतिक कारणों से या तो कम होते हैं या कर्ली हो जाते हैं. यही कारण है कि वहां सबसे ज्यादा डिमांड स्ट्रेट बालों वाली विग की है. और वहां ये सब सीधा स्टेटस सिंबल से जुड़ गया है. लोग कई-कई रंग की विग रखते हैं. केन्या में भारतीय बालों के विग की शुरुआती कीमत 63,000 रुपए के करीब है.

कितने में बिकते हैं ये बाल

टीटीडी की बात करें तो वो ई ऑक्शन से इन बालों को करीब 25,000 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचती है. ये दाम इसलिए भी ज्यादा हैं क्योंकि मंदिर से बेचे जाने वाले बाल काफी छांट-बीन के बेचे जाते हैं. वहीं सैलून्स से निकलने वाले बालों की कीमत 3,000 रुपये प्रति किलो तक रहती है.

दाढ़ी सहेजने का बिजनेस भी 100 करोड़ के पार

बालों की तो बात हो गई. दाढ़ी के दिन भी अच्छे चल रहे हैं. माने इसको सहेजने के लिए बन रहे प्रॉडक्ट्स का बिजनेस भी तगड़े तरीके से बढ़ रहा है. और जब से फिल्म स्टार्स और क्रिकेटर्स ने दाढ़ी बढ़ाने का शौक पाला है, तब से हर गली-मोहल्ले में लौंडे दाढ़ी बढ़ाए घूम रहे हैं. सोशल मीडिया पर नो शेव नवंबर की अपार सफलता के पीछे यही लोग हैं. और यही सब झेल के बियर्ड ऑयल, वॉशेज, वैक्स, सीरम और जाने क्या-क्या खरीद रहे हैं. ताकि उनकी दाढ़ी मेनटेन रहे. यही कारण है कि इस इंडस्ट्री का बिजनेस 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का हो गया है. और सभी मेल ग्रूमिंग चीजों की बात करें, तो इसका मार्केट 5000 करोड़ रुपए का हो गया है.